गुस्ताखी छाप का भाग 2 ये की मै कुए का मेंढक । तो बताऊ की उन्ही पत्रकार महोदय ने मुझे कहा की तुम अच्छा लिखते हो, रवीश कुमार को फालो करते हो पर उनकी तरह खबर नही बनाते। तुम कुए के मेंढक हो। यहा भी मै सुन ही रहा था, कह नही सकता था गुस्ताखी जो हो जाती। तो मै जो उन्हें नही कह सका वो बता रहा की उनके हिसाब से मै कुए का मेढक ही सही पर कुए की गहराई को भी देखे। दायरा कम जरुर है, पर सोच की गहराई भी है। रही बात दायरे से निकलने की तो कुए से पानी काढ़ते समय कभी-कभी आशावादी व बड़े दायरे में जाने वाले मेंढक बाल्टी में आ ही जाते है। मुझे भी इंतजार है सहारे वाले बाल्टी की जो मेरी कुए की गहराई तक पहुंच सके। और रही बात रवीश की तरह बनने की तो वो कोई नही बन सकता। कुछ मैंने उनसे सीखा है और कुछ मेरे अपने भी तरीके है.......वो आप मेरे फेसबुक पोस्ट और देवपंती ब्लाग पर पढ़ सकते है। काश महोदय ने मेरे फेसबुक पोस्ट और ब्लॉग को भी पढ़ा होता अखबारी खबरों को छोड़ कर......अख़बारो में अब वो साहस कहा जो छाप सके असल जज्बातो को, हम तो कुए के मेढक ही सही जो समझते है हर बातो को ।
Monday, 17 August 2015
दिमाग आउट ऑफ़ कंट्रोल इन माई पेशा पत्रकारिता
मै सुन रहा था कोई एक पत्रकार सज्जन समाचार लिखने का तरीका बताते हुए कह रहे थे की खबर ये बनाइए की जैसे श्रम विभाग में मजदुर की न्यूनतम पारिश्रमिक 200 रूपये प्रतिदिन होती है और सरकार जो मनरेगा योजना चला रही है, उसमे मजदूरी 150 के लगभग है। सरकार अपने ही मानको के तहत ही योजनाओ का संचालन नही कर रही है। ये तो हर के पत्रकार के लिए खबर है। पर मेरी आदत लिक से हट कर सोचने की है तो सोचा पत्रकार महोदय से कहू की महाराज वो छोडिये अपने न्यूज़ में पत्रकारों को डालिए न्यूज़ और जबरदस्त बनेगी क्यूंकि बहुत पत्रकार है जिनकी प्रतिदिन की मजदूरी उस मनरेगा वाले मजदुर से भी बद्तर है। पर पत्रकारिता के पर्वत दिगार ये कहा सोचते है, और मै कुए का मेढक मेरी क्या औकात जो उन्हें कह सकू कुछ। मै कुए का मेढक क्यों ये अगले गुस्ताखी छाप में।
डिस्परेट- दिमाग आउट ऑफ़ कंट्रोल इन माई पेशा पत्रकारिता ।
डिस्परेट- दिमाग आउट ऑफ़ कंट्रोल इन माई पेशा पत्रकारिता ।
एक सुबह घाट पर
सुबह एक दोस्त ने उठाया है.....और घाट तक ले आया है...आप क्या सोचे की मै ये कहूँगा कि.... न तो मुझे किसी ने बुलाया है..ना तो मै आया हु....मुझे तो माँ गंगा ने बुलाया है......भाई ये डायलाग प्रधान सेवक जी के नाम पेटेंट हो गया है और हम ठहरे पेसेंस वाले....हम धीरज धर लेंगे माँ ने हमे नही बुलाया.....बिन बुलाये पहुंच गये।
. है की नही साहब
यूपी के मीरजापुर जिले में पुलिस कार्यवाही स्थल के अच्छे दिन आ गये...तभी तो नगर के देहात कोतवाली क्षेत्र के भरूहना चौराहे के पास एक ऐसा पुलिसिया कार्यवाही स्थल बनाया गया है......समझ नही आता की पुलिस बूथ है.....पुलिस चौकी है या पुलिस थाना.....दरअसल ये इसलिए की बूथ है तो आस पास के बूथ देख ले.......ये शानदार और बड़ा बना है........तो चौकी....... पर चौकी है तो चौकी प्रभारी की तैनाती होनी चाहिए और चौकी के बाहर उसका नाम.....पर नाम लिखा है थाना प्रभारी सॉरी कोतवाली प्रभारी का नाम......भौकाल टाइट है। हा एक बात और की जहा पर यह पुलिस कार्यवाही स्थल बना है वहा पर साल भर पहले कोतवाल ने गरीब गुमटी वालो को हटाकर कहा था की यहा दुबारा अतिक्रमण हो तो मेरे नाम का कुत्ता पाल ले.....अब कोई इन्हें याद दिला दे........कुत्ता हमारे घर है नही आएगा तो सोचेंगे .....आम इन्सान को हर काम के लिए परमिशन लेना होता है पर पुलिस ने बिना पमिशन के ये सब बनाया है.....आप बताइए गलत है या सही .......है की नहीं साहब।
नोट - एसपी साहब का हर बात ऐसा कहना होता है। है कि नही तो इसलिए कहा मैंने की है की नहीं साहब
नोट - एसपी साहब का हर बात ऐसा कहना होता है। है कि नही तो इसलिए कहा मैंने की है की नहीं साहब
whats app news
एक पत्रकार पुरे दिन कितना संघर्ष करता है। मीडिया संस्थान उसे उसका वाजिब मेहनताना दे नही पा रहा। ऊपर से एक और फोकट की नोकरी whats app के आने से शुरू हो गई है। जिसे देखो ग्रुप बनाके whats app पे न्यूज़ लेने को लालायित है। बहुत से लोग स्वेच्छा से न्यूज़ आदान प्रदान कर रहे है। जो ठीक भी है। पर बहुतो ने तो बहुतो पे प्रेसर मार दिया है न्यूज़ के लिए। जिसमे बहुसंख्यक इलेक्ट्रानिक मीडिया वाले है। जिन्हें खबर के पुष्टी की कम ब्रेकिंग की ज्यादा जल्दी रहती है। बात whats app नोकरी की हो रही थी। कुछ ऐसे तत्व है जो खबरों पे तो कम रहते है पर खबर उन्हें पहले चाहिए। इसके लिये जैसे झौआ भर चैनल व अख़बार आ गए है वैसे ही whats app पे ग्रुप खुल गए है। जिसमे अपनी दुकानदारी चलाने के लिए लोग दुसरो के दुकान से संपर्क साधे हुवे है। ऐसे में अपनी दुकानदारी चलाना मुश्किल हो गया है। ........मगरुआ तू मत लिहे ई whats app वाला फोन नहीं तहु के चलाना पढ़े दूसरे क दुकान।
Monday, 19 January 2015
वो है बेहतरीन (गेस्ट कालम)
ब्लाग को हमेशा अपडेट करना भी इस भागमभाग के समय में मुश्किल लगा तो सोचा.......जब अन्य लोग भी जुड़े है तो............स्थान उनका भी होना चाहिए इस पर .......उनके लिए ही शुरू किया मैने गेस्ट कालम........जिसकी शुरूआत पहले भी हुई है...........पर वो अनौपचारिक था............अब औपचारिक रूप से सबका स्वागत है.............इस कड़ी में आयी पहली कविता मेरी मित्र स्मृति बरनवाल का है.........वो लिखती रहती है.........उनसे आग्रह किया तो शुरूआत उन्होंने..........हमारे मित्र मण्डली की टीम महादेव टीम को समर्पित किया ये कविता................. वो है बेहतरीन: साभार-स्मृति बरनवाल (गेस्ट कालम)
दोस्ती पर कुछ लिखना था मुझे,
ढुढ़ रही थी कुछ जोड़ना थे मुझे।
मौसमो में झांका, यादो को टटोला,
एहसासो से भी पुछा,
फिर जब कुछ ना मिला तो
दिल से की गुफ्तगु।
क्या होती है दोस्ती ?
वहम बन जाती है मोहब्बत की कभी,
कभी लगती सबसे अनोखी।
कई साल गुजरे,
दोस्ती पर कुछ लिखना था मुझे,
ढुढ़ रही थी कुछ जोड़ना थे मुझे।
मौसमो में झांका, यादो को टटोला,
एहसासो से भी पुछा,
फिर जब कुछ ना मिला तो
दिल से की गुफ्तगु।
क्या होती है दोस्ती ?
वहम बन जाती है मोहब्बत की कभी,
कभी लगती सबसे अनोखी।
कई साल गुजरे,
पर मैं और मेरी दोस्ती वैसी की वैसी।
हां कुछ पल आये कठिन,
और कुछ खुशी के भी,
पर दोस्ती रही वही सम्भली हुई।
कोई दोस्त उन जैसा ना मिला,
ना वैसी दोस्ती हुई कभी।
कुछ लिखुं और क्या ज्यादा,
जब ये उलझी अनकही,
वो है बेहतरीन....बेहतरीन.....बेहतरीन।
हां कुछ पल आये कठिन,
और कुछ खुशी के भी,
पर दोस्ती रही वही सम्भली हुई।
कोई दोस्त उन जैसा ना मिला,
ना वैसी दोस्ती हुई कभी।
कुछ लिखुं और क्या ज्यादा,
जब ये उलझी अनकही,
वो है बेहतरीन....बेहतरीन.....बेहतरीन।
Tuesday, 13 January 2015
देखो इस गोले पर कैसे रैचों भी बन गया पीके ?
कछू नाम नाहीं हमारा.....पता नाही सब काहे पीके-पीके कहत है ?
इस कहानी का देखे एक कवितात्मक एंव व्यंगात्मक प्रसतुतीकरण......
साभार-आशीष जायसवाल
इस गोले पर आता है एक अलबेला मेहमान,
खड़े-खड़े से कान थे उसके, था नंगा इंसान,
आते ही जब मिला चोर वो रह गया हैरान,
इस गोले की हर खुबी से था वो बिल्कुल अंजान।
नहीं आती थी कोई भाषा पकड़ता था सबके हाथ,
उसकी उल्टी इस हरकत में कोई न देता साथ,
देखे सबका वो फैशनवा समझे चमड़ी की बात,
दमड़ी का जब दम वो समझा ढूढ़े डांसिंग कार दिन-रात।
इस गोले पर रहने के लिए उसने ढुंढ़ा बापु का चेहरा,
इस चमकीले चेहरे से जीवन का संबंध था गहरा,
जब लगा खोजने उस चेहरे को उसने तोड़ दिया सब पहरा,
कर डाली सब कोशिशे नोटो पर जाकर वो ठहरा।
फिर उसके भाया ने उसे एक भाषा सिखलवाई,
फूल-पैशन से "व्यक्ति विशेष" ने थी अपनी हाथ पकड़ाई,
छः घण्टे के कांपरेशन ने की थी जिसकी सप्लाई,
खाके पान खुला जब भेजा फिर भोजपुरी उसे आई।
अपना रिमोटवा पाने के लिए वो राजधानी में जा डटा,
क्या-क्या अब बतलाएं था क्या-क्या उसके साथ घटा,
हर मैनेजर और कम्पनियां देते थे उसे मंजिल से हटा,
धर्म-विडंबनाओं और आडंबरो से था ये गोला ऐसे पटा।
फिर रंगो का उसने समझा उल्टा सीधा भेद,
कहां सुहागन काली है और कहां पर काला खेद,
कहां पर जुता पहने या देखे चप्पल में छेद,
कहीं खुशी का कहीं पर गम का कैसा रंग सफेद ?
फिर उसको जा मिली जगतजननी 'जग्गु' कूल,
एस्ट्रोनाएड ने तब बतलाई अपनी स्टोरी-ट्रेजडी फूल,
तब जाके सब समझे रांग नम्बर और फिरकी का मूल,
मीडिया के "एक और सवाल" ने कर दिया तपस्वी को 'लूल'।
इस पूरी इंटरटेनमेंट में बस समझ में आई एक लाईन,
चढ़ाओ प्रसाद, चादर चाहे वाइन.....लव इज " वेस्ट आफ टाईम",
उल्टे-पुल्टे इस गोले का उल्टा पुल्टा जी. के. ,
देखो इस गोले पर कैसे रैचों भी बन गया पीके ?
इस कहानी का देखे एक कवितात्मक एंव व्यंगात्मक प्रसतुतीकरण......
साभार-आशीष जायसवाल
इस गोले पर आता है एक अलबेला मेहमान,
खड़े-खड़े से कान थे उसके, था नंगा इंसान,
आते ही जब मिला चोर वो रह गया हैरान,
इस गोले की हर खुबी से था वो बिल्कुल अंजान।
नहीं आती थी कोई भाषा पकड़ता था सबके हाथ,
उसकी उल्टी इस हरकत में कोई न देता साथ,
देखे सबका वो फैशनवा समझे चमड़ी की बात,
दमड़ी का जब दम वो समझा ढूढ़े डांसिंग कार दिन-रात।
इस गोले पर रहने के लिए उसने ढुंढ़ा बापु का चेहरा,
इस चमकीले चेहरे से जीवन का संबंध था गहरा,
जब लगा खोजने उस चेहरे को उसने तोड़ दिया सब पहरा,
कर डाली सब कोशिशे नोटो पर जाकर वो ठहरा।
फिर उसके भाया ने उसे एक भाषा सिखलवाई,
फूल-पैशन से "व्यक्ति विशेष" ने थी अपनी हाथ पकड़ाई,
छः घण्टे के कांपरेशन ने की थी जिसकी सप्लाई,
खाके पान खुला जब भेजा फिर भोजपुरी उसे आई।
अपना रिमोटवा पाने के लिए वो राजधानी में जा डटा,
क्या-क्या अब बतलाएं था क्या-क्या उसके साथ घटा,
हर मैनेजर और कम्पनियां देते थे उसे मंजिल से हटा,
धर्म-विडंबनाओं और आडंबरो से था ये गोला ऐसे पटा।
फिर रंगो का उसने समझा उल्टा सीधा भेद,
कहां सुहागन काली है और कहां पर काला खेद,
कहां पर जुता पहने या देखे चप्पल में छेद,
कहीं खुशी का कहीं पर गम का कैसा रंग सफेद ?
फिर उसको जा मिली जगतजननी 'जग्गु' कूल,
एस्ट्रोनाएड ने तब बतलाई अपनी स्टोरी-ट्रेजडी फूल,
तब जाके सब समझे रांग नम्बर और फिरकी का मूल,
मीडिया के "एक और सवाल" ने कर दिया तपस्वी को 'लूल'।
इस पूरी इंटरटेनमेंट में बस समझ में आई एक लाईन,
चढ़ाओ प्रसाद, चादर चाहे वाइन.....लव इज " वेस्ट आफ टाईम",
उल्टे-पुल्टे इस गोले का उल्टा पुल्टा जी. के. ,
देखो इस गोले पर कैसे रैचों भी बन गया पीके ?
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