Friday, 29 May 2020

देखती हो पर इजहार नहीं करती


देखती हो पर इजहार नहीं करती,
शायद तुम मुझसे प्यार नहीं करती।

देखते है युही तुमको हम भी अपनी निगाहों से,
चाहते तो है हम तुमको, पर इजहार नहीं करते डर से।

वैसे इजहार के इंतजार में है हम कब से,
लॉक डाउन में मिल रहे नहीं हो तुम हमसे।

क्वारन्टीन हो गई हो तुम अपने हम में,
आइसोलेट होने का मन है तुम्हारे संग में

आइसोलेट होने वाला सोचे निगेटिव रिपोर्ट आए हर बार,
पर हमें है प्यार के सैम्पल में पाजिटिव रिपोर्ट का इंतजार।

तो करोना तुम प्यार का इजहार,
आस लगाए बैठे है हम दिन रात।

Tuesday, 26 May 2020

एक तरफा प्यार..

एक तरफा प्यार...


लिखा होता है तकदीर में जिसका नाम,
आखिर मिलता है उसको उसी का साथ।
हर किसी को नहीं मिलता उसका आजीवन साथ,
जिसके लिए दिल में होता है  प्यार का एहसास।
इशारों ही इशारों में बातों ही बातों कहनी होती है जो बात,
उसके लिए दिल और दिमांग को करना होता है एक साथ।
समझ कर जो प्यार होता है,सोच कर इजहार नहीं होता,
अगर ना मिले वो तो कहते है जीवन साकार नहीं होता।

एक तरफ प्यार.....सबको होता है जीवन में एक बार। 

Sunday, 24 May 2020

हेलो, तुम भी हमे फोन कर लिया करो ना




हेलो, तुम भी हमे फोन कर लिया करो ना।

क्यों? तुम तो करते ही हो, फिर मेरे करने से क्या अलग होगा। 

यही नहीं समझी तुम

क्या नहीं समझी

यही कि मेरे फोन पर कालर ट्यून लगा है।

वो तो अब सब में लगा है, सरकार ने कोरोना कॉलर ट्यून फ्री में लगाया है। नहीं-नहीं मुझे नहीं सुनना कोरोना वाला। 

तुमसे किसने कहा मेरे में कोरोना वाला लगा है। 

सब में वही बजता है, तो तुम्हारे में भी वही होगा। इसलिए मैंने फोन करना बंद कर दिया है। 

सब में कोरोना ट्यून बजता है। सब को कोरोना हो सकता है, पर सबको मोहब्बत थोड़े ही होता है। 

तुम क्या कह रहे, कोरोना, कॉलर ट्यून, मोहब्बत। समझ नहीं आ रहा। तुम मिलों।

लॉक डाउन में मिलना ही तो नहीं हो रहा। इसलिए कह रहा फोन कर लिया करो। दिल के जो जज्बात मिल के न कह सकूंगा, तुम कॉलर ट्यून से समझ लेना।

कौन सा ट्यून लगाए हो वैसे।

मोहब्बत बरसा देना तुम लॉक डाउन आया है।

ये कौन सा ट्यून है।

ये लॉक डाउन मोहब्बत वाला ट्यून है।

तुमने मेरा वाला ट्यून सुना।

हां... वही न हम तुम्हें चाहते है ऐसे वाला।

#लॉकडाउन_लप्रेक
#लॉकडाउन_मोहब्बत
#देवपंती

Friday, 13 January 2017

इन भक्तो से भगवान बचाये, ये तो भगवान से भी आगे है


मुझे लगता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मादी से भी अगर कोई बात करते समय
उनकी किसी निति या बात का लाजिकल उत्तर देकर उसे गलत बताये तो उससे लडेंगे नहीं। पर इन भक्‍तो से भगवान बचाये। एक कार्यक्रम में नोटबंदी पर चर्चा होने लगी। उसमें भक्त ने कहा कि जनता मोदी जी का समर्थन कर रही है इसलिए सडक पर नहीं आयी। इस पर मैने कह दिया कि अनता को उनसे आस है। इसलिए सडक पर नहीं आयी। पर जब आस खत्म होगी। जो आस है वो पूरा नहीं होगा तो जनता सडक पर न आकर तख्त पलट देगी। इस पर भक्त ने जोड दिया कि अगले पंचवर्षीय में हटा देगी। 60 साल भुल गये। हटा देगी तो क्या होगा।15 साल तक तो र हेंगे ही। शायद ये 60 साल के दौरान लालबहादुर शास्त्री के कार्यकाल को भूल जाते है। इस दौरान चर्चा में एक पत्रकार जो भक्त दल से जुडे है। उनसे कह दिया कि वे पत्रकार है तो दोनों बातो को रखना चाहिए। अच्छे और बूरे दोनों। पर दल से जुडे है तो कैसे रख सकेंगे। पर इस उन्होंने कहा कि आप वोट देते है। तो आप भी तो किसी दल से जुडे हो। ये क्या लाजिक है। मेन स्ट्रीम पत्रकारिता और मेन स्ट्रीम राजनीति एक साथ कैसे हो सकती है।राजनीति करना है तो शलभमणि त्रिपाठी, आशुतोष आदि फला फला बन जा‍यिए।लिखना शौक है तो स्वतंत्र होकर लिखिए। पर एक दल की राजनीति करते हुए एकअखबार या चैनल की पत्रकारिता कैसे कर सकते हो। वैसे कर सकते हो जी न्यूज व सुभाष चंद्रा तो कर ही रहे है और भी बहुत से चैनल व पत्रकार कर ही रहे है। ऐसे लोगों को समाज समझ्‍ने लगा है। आपको भी समझ् ही रहे होंगे। आप इनसे इतर थोडे होंगे। मोदी जी के सादगी की चर्चा भी भक्त खुब करते है। पर उनसे अगर उनकी पार्टी के दूसरे नेताओं पर चर्चा करिये तो अलग लाजिक देंगे। नोटबंदी में गडकरी जी के घर जो शादी हुयी क्या तो कम बजट में नहीं हो सकती थी। क्या आदर्श प्रस्तुत नहीं किया जा सकता था। इस पर वो उन्‍हें बिजनेश मैन बना देते हैं । अब मैन नहीं कहूंगा कि उनकी बेनामी कंपनियों का भी मामला प्रकाश में आया था। क्यों कि भक्त कहेंगे साबित कुछ नहीं हुआ। वैसे भी साबित तो किसी नेता का कुछ नहीं होता। साबित होता तो बहुत से नेता जेल में होते। नोटबंदी के फैसले को सही कहते हुए अगर आपने उसमें किसी नियम तक को गलत कह दिया तो भक्त आप पर दस सवाल दाग देंगे। चर्चा में एक भक्त ने मुझ पर दाग ही दिया कि आप लाइन में लगे,आपके पास अाधार है, आपके पास पैन कार्ड है, आप मेहनत का पैसा जमा किये हो। भक्त को तो जवाब दे ही दिया । पर अगर उन भक्त से पूछ लेता आप जो कमाये उसका हिसाब है। कहां से कमाये हो तो सब भक्ति निकल जाती। पर कुछ सम्मान करना था वहां, इसलिए नहीं पूछा। इन्ही भ्‍क्त से कहा कि अन्ना का लोकपाल क्या हुआ पूछा तो कहने लगे कैसा लोकपाल चाहिए। मैने कहा जो सत्ता में आने से पहले चाहते थे तो कहने लगे नोटबंदी वहीं है। वाह क्या लाजिक है। इसलिए कहता हूं इन अंध भक्तो से भगवान बचाये।

Wednesday, 21 December 2016

सड़क पर दिखता है 'यादव' 'राज' रफ्तार भरते है 'मोदी' 'दादा'



                                      बतौर मुख्यमंत्री तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव का राज है।
                                      पर सड़को पर भी यादव राज दिखायी देने लगा है।
                                      महात्मा गांधी के रामराज की परिकल्पना भले ही पूरी न हो पा रही हो, पर
                                      जिले की सड़को पर 'राम' 'राज' भी दिखाई दे रहा है। यही नहीं 'यादव' 'राज',
                                      'राम' 'राज' के साथ सड़को पर मोदी भी रफ्तार भर रहे है। आप भी सोच रहे
                                      होंगे कि ये कैसा 'यादव' 'राज' व 'राम' 'राज' है जो  देश-प्रदेश के साथ
                                      मीरजापुर  की सड़को पर दिख रहा है। बता दें कि बात महात्मा गांधी के
                                      रामराज की नहीं बल्कि गाड़ी के नंबरो को शब्दो में लिख कर चल रहे राम व
                                      राज की हो रही है।  इसी तरह मोदी, दादा और पापा लिखे नंबर प्लेट वाले
                                     वाहन भी सड़को पर रफ्तार भर रहे है।

                      गाड़ी का नंबर अंको में लिखने के बजाय नंबर को युनिक करने के लिए उसे
                      शब्दो में लिखने का प्रचलन बढ़ गया है। इसके लिए वाहन मालिक उन्हीं अंको
                     को चुन रहे है, जिससे उनके पसंद के शब्द बन जाए। इन्हीं शब्दो में खास
                     शब्द है  राम, राज, यादव , मोदी, दादा व पापा। राम शब्द लिखने के लिए
                     लोग चार अंको के वाहन संख्या में किसी भी संख्या का प्रथम अंक लेने के
                     बाद  उसके आगे 214 का अंक लेते है। 214 अंक व 2746 अंक से शब्द में राम
                     तैयार होता है ।
 इसी तरह राज शब्द लिखने के लिए 2151 अंक लेते है। 2151
                     को इस तरह से लिखा जाता है कि वह शब्दो में राज लिखा नजर आता है। दादा व
                    पापा लिखने के लिए 4141 अंक लिया जाता है। इस अंक से शब्दो में दादा व
                    पापा तैयार हो जाता है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके
                    नाम मोदी का प्रचलन तेजी से बढ़ा है।   वाहन पर अंको को शब्दो मे बदलने की
                    कारीगरी दिखाने वाले पेंटरो ने इस शब्द के लिए भी अंको को तलाश लिया।
                   मोदी लिखने के लिए 4749 अंक को चुना। 
प्रदेश में तो अखिलेश यादव का  है ही। तो  उनके                      समर्थक वाहनो के नंबर प्लेट पर वाहन नंबर 4149  को  यादव के रुप में लिख कर चल रहे                     है। अंको में इन्हीं यूनिक शब्दो को पाने के बाद वाहन चालक नियमो को तोड़कर नंबर प्लेट                      पर राम-राज, पापा व मोदी आदि शब्द लिख  कर चल रहे है।

Tuesday, 6 December 2016

लप्रेक_लव_टाइम_इन_नोटबंदी

हेल्लो राहुल हैप्पी बड्डे सारी यार मैंने लेट में विश किया।
कोई बात नही यार
क्यों कोई बात नही, मुझे पहले विश करना था न। मैंने फोन भी किया रात में, पर तुम्हारा फोन नही लगा फिर whats aap किया ।
ठीक है अभी तो कर रही हो न फोन पर ।
क्या ठीक है बाकि तो पहले कर दिए होंगे, मै पीछे रह गई।
नही यार शालू तुम ऐसे मत सोचो तुम मेरे 100 प्रतिशत हो। बाकि सब दसमलव के बाद।
ओ..... ये बात तब ठीक है
ये बातओ बड्डे पर क्या कर रहे हो
क्या करू क्या ....रोज की तरह ऑफिस
अरे राहुल पार्टी नही करनी
क्या पार्टी एक तो तुम हो नही ऊपर से नोट बंदी
नोटबन्दी से याद आया राहुल तुम मुझसे भी तो दूर नही चले जाओगे पुराने नोट की तरह ।
नही शालू तुम तो मेरी महात्मा गांधी हो।
महात्मा गांधी
हा बाबा ...महात्मा गांधी .... नयी करन्सी कोई भी आये। दिल पर तो तस्वीर तुम्हारी ही है और रहेगी।

Thursday, 25 August 2016

मैं सोचता हूं तो यह सोचता हूं (गेस्ट कालम)


हिंदी प्रेमी मित्र आशीष जायसवाल ने बहुत दिनो के बाद अपनी एक कविता प्रेषित की है। वैसे तो इनकी कई कविताओं का संग्रह मेरे पास है। पर मैं उसे प्रसारित नहीं कर पा रहा हूं। मित्र की इस नयी कविता से बाकी कविताएं। जल्‍द ही आपको मिलेगा पढने को। तो ि‍फलहाल के लिए आशीष जायसवाल "आशु" की कविता ।  (गेस्ट कालम)













मैं सोचता हूं तो यह सोचता हूं 
जो देखा है सबने मैं क्या वो देखता हूं।

हर पल देखते है नए कलेवर,
अपनो के बदलते यह तीखे से तेवर,
धन की लड़ाई  और लालच का मंजर,
जो खुद के दिलो को बनाता है बंजर, 

यह पैसे की चाहत है या झूठा दिखावा,
अपनों को ठगना यह कैसा छलावा,  
खुद का प्रदर्शन और पैसे का लोभ,
प्रेम की नदियाें में लाता विछोभ,

अपनो का अपनो से यूं ही बिछड़ना,
संपत्ति को लेकर भाई-भाई का लडना-झगड़ना ,
खून के रिश्तो में  कैसे आता है यह भेद,
जो टूटे "घर-मंदिर" से उड़ती है रेत,

बनते थे जो बेटे बाप का सहारा,
लगता है उन्हें भारी मां-बाप का गुजारा, 
टूट के बिखरने के कैसे बहाने,
समय की गति से क्या बनते अपने बेगाने ?

अब सोचता हूं  तो यह सोचता हूं
जो सोचा है मैंने क्या सही सोचता हूं?