Monday, 17 August 2015

दिमाग आउट ऑफ़ कंट्रोल इन माई पेशा पत्रकारिता

मै सुन रहा था कोई एक पत्रकार सज्जन समाचार लिखने का तरीका बताते हुए कह रहे थे की खबर ये बनाइए की जैसे श्रम विभाग में मजदुर की न्यूनतम पारिश्रमिक 200 रूपये प्रतिदिन होती है और सरकार जो मनरेगा योजना चला रही है, उसमे मजदूरी 150 के लगभग है। सरकार अपने ही मानको के तहत ही योजनाओ का संचालन नही कर रही है। ये तो हर के पत्रकार के लिए खबर है। पर मेरी आदत लिक से हट कर सोचने की है तो सोचा पत्रकार महोदय से कहू की महाराज वो छोडिये अपने न्यूज़ में पत्रकारों को डालिए न्यूज़ और जबरदस्त बनेगी क्यूंकि बहुत पत्रकार है जिनकी प्रतिदिन की मजदूरी उस मनरेगा वाले मजदुर से भी बद्तर है। पर पत्रकारिता के पर्वत दिगार ये कहा सोचते है, और मै कुए का मेढक मेरी क्या औकात जो उन्हें कह सकू कुछ। मै कुए का मेढक क्यों ये अगले गुस्ताखी छाप में।
डिस्परेट- दिमाग आउट ऑफ़ कंट्रोल इन माई पेशा पत्रकारिता ।

एक सुबह घाट पर

सुबह एक दोस्त ने उठाया है.....और घाट तक ले आया है...आप क्या सोचे की मै ये कहूँगा कि.... न तो मुझे किसी ने बुलाया है..ना तो मै आया हु....मुझे तो माँ गंगा ने बुलाया है......भाई ये डायलाग प्रधान सेवक जी के नाम पेटेंट हो गया है और हम ठहरे पेसेंस वाले....हम धीरज धर लेंगे माँ ने हमे नही बुलाया.....बिन बुलाये पहुंच गये।  

.‎ है की नही साहब

 यूपी के मीरजापुर जिले में पुलिस कार्यवाही स्थल के अच्छे दिन आ गये...तभी तो नगर के देहात कोतवाली क्षेत्र के भरूहना चौराहे के पास एक ऐसा पुलिसिया कार्यवाही स्थल बनाया गया है......समझ नही आता की पुलिस बूथ है.....पुलिस चौकी है या पुलिस थाना.....दरअसल ये इसलिए की बूथ है तो आस पास के बूथ देख ले.......ये शानदार और बड़ा बना है........तो चौकी....... पर चौकी है तो चौकी प्रभारी की तैनाती होनी चाहिए और चौकी के बाहर उसका नाम.....पर नाम लिखा है थाना प्रभारी सॉरी कोतवाली प्रभारी का नाम......भौकाल टाइट है। हा एक बात और की जहा पर यह पुलिस कार्यवाही स्थल बना है वहा पर साल भर पहले कोतवाल ने गरीब गुमटी वालो को हटाकर कहा था की यहा दुबारा अतिक्रमण हो तो मेरे नाम का कुत्ता पाल ले.....अब कोई इन्हें याद दिला दे........कुत्ता हमारे घर है नही आएगा तो सोचेंगे .....आम इन्सान को हर काम के लिए परमिशन लेना होता है पर पुलिस ने बिना पमिशन के ये सब बनाया है.....आप बताइए गलत है या सही .......है की नहीं साहब।
नोट - एसपी साहब का हर बात ऐसा कहना होता है।  है कि नही तो इसलिए कहा मैंने की है की नहीं साहब 

whats app news

एक पत्रकार पुरे दिन कितना संघर्ष करता है। मीडिया संस्थान उसे उसका वाजिब मेहनताना दे नही पा रहा। ऊपर से एक और फोकट की नोकरी whats app के आने से शुरू हो गई है। जिसे देखो ग्रुप बनाके whats app पे न्यूज़ लेने को लालायित है। बहुत से लोग स्वेच्छा से न्यूज़ आदान प्रदान कर रहे है। जो ठीक भी है। पर बहुतो ने तो बहुतो पे प्रेसर मार दिया है न्यूज़ के लिए। जिसमे बहुसंख्यक इलेक्ट्रानिक मीडिया वाले है। जिन्हें खबर के पुष्टी की कम ब्रेकिंग की ज्यादा जल्दी रहती है। बात whats app नोकरी की हो रही थी। कुछ ऐसे तत्व है जो खबरों पे तो कम रहते है पर खबर उन्हें पहले चाहिए। इसके लिये जैसे झौआ भर चैनल व अख़बार आ गए है वैसे ही whats app पे ग्रुप खुल गए है। जिसमे अपनी दुकानदारी चलाने के लिए लोग दुसरो के दुकान से संपर्क साधे हुवे है। ऐसे में अपनी दुकानदारी चलाना मुश्किल हो गया है। ........मगरुआ तू मत लिहे ई whats app वाला फोन नहीं तहु के चलाना पढ़े दूसरे क दुकान।

Monday, 19 January 2015

वो है बेहतरीन (गेस्ट कालम)

ब्लाग को हमेशा अपडेट करना भी इस भागमभाग के समय में मुश्किल लगा तो सोचा.......जब अन्य लोग भी जुड़े है तो............स्थान उनका भी होना चाहिए इस पर .......उनके लिए ही शुरू किया मैने गेस्ट कालम........जिसकी शुरूआत पहले भी हुई है...........पर वो अनौपचारिक था............अब औपचारिक रूप से सबका स्वागत है.............इस कड़ी में आयी पहली कविता मेरी मित्र स्मृति बरनवाल का है.........वो लिखती रहती है.........उनसे आग्रह किया तो शुरूआत उन्होंने..........हमारे मित्र मण्डली की टीम महादेव टीम को समर्पित किया ये कविता................. वो है बेहतरीन: साभार-स्मृति बरनवाल (गेस्ट कालम)







दोस्ती पर कुछ लिखना था मुझे,
ढुढ़ रही थी कुछ जोड़ना थे मुझे।
मौसमो में झांका, यादो को टटोला,
एहसासो से भी पुछा,
फिर जब कुछ ना मिला तो
दिल से की गुफ्तगु।
क्या होती है दोस्ती ?
वहम बन जाती है मोहब्बत की कभी,
कभी लगती सबसे अनोखी।
कई साल गुजरे,
पर मैं  और मेरी दोस्ती वैसी की वैसी।
हां कुछ पल आये कठिन,
और कुछ खुशी के भी,
पर दोस्ती रही वही सम्भली हुई।
कोई दोस्त उन जैसा ना मिला,
ना वैसी दोस्ती हुई कभी।
कुछ लिखुं और क्या ज्यादा,
जब ये उलझी अनकही,
वो है बेहतरीन....बेहतरीन.....बेहतरीन।

Tuesday, 13 January 2015

देखो इस गोले पर कैसे रैचों भी बन गया पीके ?

कछू नाम नाहीं हमारा.....पता नाही सब काहे पीके-पीके कहत है ?
इस कहानी का देखे एक कवितात्मक एंव व्यंगात्मक प्रसतुतीकरण......
साभार-आशीष जायसवाल










इस गोले पर आता है एक अलबेला मेहमान,
खड़े-खड़े से कान थे उसके, था नंगा इंसान,
आते ही जब मिला चोर वो रह गया हैरान,
इस गोले की हर खुबी से था वो बिल्कुल अंजान।

नहीं आती थी कोई भाषा पकड़ता था सबके हाथ,
उसकी उल्टी इस हरकत में कोई न देता साथ,
देखे सबका वो फैशनवा समझे चमड़ी की बात,
दमड़ी का जब दम वो समझा ढूढ़े डांसिंग कार दिन-रात।

इस गोले पर रहने के लिए उसने ढुंढ़ा बापु का चेहरा,
इस चमकीले चेहरे से जीवन का संबंध था गहरा,
जब लगा खोजने उस चेहरे को उसने तोड़ दिया सब पहरा,
कर डाली सब कोशिशे नोटो  पर जाकर वो ठहरा।

फिर उसके भाया ने उसे एक भाषा सिखलवाई,
फूल-पैशन से  "व्यक्ति विशेष" ने थी अपनी हाथ पकड़ाई,
छः घण्टे के कांपरेशन ने की थी जिसकी सप्लाई,
खाके पान खुला जब भेजा फिर भोजपुरी उसे आई।

अपना रिमोटवा पाने के लिए वो राजधानी में जा डटा,
क्या-क्या अब बतलाएं था क्या-क्या उसके साथ घटा,
हर मैनेजर और कम्पनियां देते थे उसे मंजिल से हटा,
धर्म-विडंबनाओं और आडंबरो से था ये गोला ऐसे पटा।

फिर रंगो का उसने समझा उल्टा सीधा भेद,
कहां सुहागन काली है और कहां पर काला खेद,
कहां पर जुता पहने या देखे चप्पल में छेद,
कहीं खुशी का कहीं पर गम का कैसा रंग सफेद ?

फिर उसको जा मिली जगतजननी 'जग्गु' कूल,
एस्ट्रोनाएड ने तब बतलाई अपनी स्टोरी-ट्रेजडी फूल,
तब जाके सब समझे रांग नम्बर और फिरकी का मूल,
मीडिया के "एक और सवाल" ने कर दिया तपस्वी को 'लूल'।

इस पूरी इंटरटेनमेंट में बस समझ में आई एक लाईन,
चढ़ाओ प्रसाद, चादर चाहे वाइन.....लव इज " वेस्ट आफ टाईम",
उल्टे-पुल्टे इस गोले का उल्टा पुल्टा जी. के. ,
देखो इस गोले पर कैसे रैचों भी बन गया पीके  ?








Saturday, 10 January 2015

कायनात से कहानी तक



बचपन में दादी, नानी से कहानी सभी ने सुनी होगी। कुछ दादी-नानी से नही तो किसी अन्य से तो सूनी ही होगी। दरअसल दादी-नानी पात्र कहानियां सुनाने की ब्रांड एम्बेसडर है, तो इन्हीं का जिक्र आता है। बचपन में मैने भी सुनी है। पर 25 के उम्र में कम ही समय मिलता होगा कि रात के समय बिस्तर में हो....लाइट कटी हो......मगरूआ के साथ पूरे घर के लोग टीवी पर अपने-अपने प्रोग्राम से इंटरटेन होने का इंतजार कर रहे हो। ऐसे में कोई आपको किस्से-कहानियों को सुनाकर न सिर्फ आपने बचपन की याद दिला देता है। बल्कि जिस वर्तमान में है, उसे भी यादगार बना देता है। कहानी सच्ची हो तो उसे सुनने का रोमांच बढ़ जाता है। एक ठिकाना मुझे मिला, जहां पर मेरी बुकिंग तो पहले ही हो गयी थी, बस मैं ही टिकट नहीं कटा पा रहा था। टिकट कटा भी तो ऐसे जैसे किसी फिल्म का डायलाग है ना कि किसी को सिद्दत से चाहो तो पूरी कायनात उसे मिलाने में लग जाती है।  ऐसा ही हुआ नये साल के प्रथम दिन। आया तो था वाराणसी अपने महादेव टीम के साथ नया साल मनाने। फिर पानी ने पीके दिखाया और ये पानी का बरसना वो डायलाग वाला कायनात ही था कि पीके देखने के बाद उस ठौर-ठिकाने पर पहुंचने का नसीब हुआ। जिसका टिकट एटैंडम ही कट गया। फिर मिल बैठे तीन यार जाने को हुए उस ठिकाने को तैयार। जिसमें से एक तो थी उसी ठिकाने की सरदार, दुसरा था अपना चार साल बाद मिलने वाला यार। ठिकाने पहुंचने तक कायनात भी था अपने साथ। पहुंचे जब हम ठिकाने को तो क्या नजारा था। ठंड के साथ बारिश की बुंदो ने उसे सवांरा था, लाईट हुई गुल थी, ये भी कायनात की ही किया कराया था। और वहां पर माता-पिता और बहन जैसा कोई इंतजार में टकटकी लगाया था। बहुत दिनो बाद उनसे मिलने का सौभाग्य आज आया था। इसके बाद पीके देखकर आये थे तो कुछ देर पकपकाये। अंत में खा-पीकर कहानी सुनने को आये। कहानी सुनने के पहले हमारे पिता तुल्य अंकल रमेश चन्द्र सिंन्हा जी ने बताया अपने कहानी संग्रह के बारे में। बताया कि कह तो दूं बहुत पर लिखने में है परेशानी। उससे पहले में आपको एक और बात बता दूं उनकी बिटिया ने कहा था कि बाउ बहुत पकायेंगे, अपनी टांग अड़ाओगे तो अपने ही सुर में गायेंगे। अंकल के पास सच्ची कहानियों का था अच्चा कलेक्शन, पर बिटिया ने पहले ही सुन रखी थी तो बीच-बीच में करती रही आब्जेक्शन कि ये भुल गये, वो छुट गया। इस बीच दो कहानियों को अंकल ने सुनाया। जिसे बचपन में सुनता तो दिल होता घबराया.....अब था 25 का तो लगा रहा था दिमाग की छत्तीश। अंकल की कहानी थी भुत और परी की। जिसे मैं आज के सन्दर्भ में कहुंगा पाजिटिव व निगेटिव शक्तियां। ये भी एक संयोग ही था कि दिन में पीके देख के आया था। जिसने आडम्बरो से पर्दा उठाया था। रात में भुतियां कहानी सुना.....जिसमें उनका भी अपना स्थान बताया था। एक कहानी में अंकल ने बताया कि जब वो इलाहाबाद में रहते थे एक भुत उनके शरीर पर कब्जा कर लिया था। बताया कि वो रोज अपने मित्र से मिलने जाते या अन्य किसी काम से जाते तो वापस आते समय घर के पास स्थित एक पेड़ के पास उनका मित्र उनसे वहीं मिल जाता। बाद में पता चला कि पेड़ के पास तो उनका मित्र उनसे मिला ही नहीं। इस बीच ये भी बताया कि नल  के पास जाते तो उसमें हाथ लगाते ही पानी आना बंद हो जाता। इस बात पर मुझे वर्तमान याद आया कि कही उसी नल से प्रेरित होकर आज का नल तो नहीं बना....जो बड़े होटलो में लगा होता है। जिसमें हाथ लगाते ही पानी आता है पर हाथ हटाते ही चला जाता है। उस नल के विलोम जैसा। फिर बताया कि कैसे ताबिज आदि पहने फिर जाकर सब ठीक हुआ। ये पुछने पर कि क्या वो ताबिज अभी भी पहने है तो बताया कि कभी नहाते समय गुम हो गया। लेकिन फिर कभी उन्हें कुछ प्रतीत नहीं हुआ। दुसरी कहानी का रोमांच ज्यादा था। जिसमें परी प्यारी न होकर परेताई हो गयी थी। अंकल ने बताया कि उनके पिता के मामा जो गाजीपुर में रहते थे। उस जमाने में उनके ठाठ थे। वे बग्घी से चलते थे। इसी बीच अंकल ने पढ़ाई से ब्रेकअप शब्द का जिक्र किया.....तो मेरे मन में आया कि ब्रेकअप का दौर तब भी था.....बस अब उसका साम्राज्य कई क्षेत्रो में फैल गया है। बताया कि उनके पिता के मामा एक बार बग्घी से घर जा रहे थे तो उन्हें एक परी दिखी थी। कुछ दिनो बाद उनकी शादी हो गया। शादी के कुछ महिने बाद वो बीमार हो गये। काफी इलाज के बाद वे ठीक नहीं हुए। डाक्टरो ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। पर उनके पिता ने उन्हें जलाया नहीं। घर के पास ही स्थित कुंए के पास उनके जरूरी सामान के साथ सोफा, बेड, किताबे इत्यादि वस्तुओं के साथ उन्हें वहां दफनाया गया। कुछ दिनो के बाद उनके साथ कब्र में डाली गयी चीजे कुंए में तैरती दिखी। तो फिर कब्र को खुलवाया गया। कब्र को देख सभी आश्चर्यचकित रह गये। वहां से शरीर गायब था। फिर बनारस से प्रकाण्ड ब्राहमण बुलाये गये। फिर कई दिनो तक पूजा -हवन इत्यादि हुआ। इसके बाद ब्राहमणो ने बताया कि वो किसी भी रिश्तेदार को एक-एक कर तीन बार दिखाई देगे। इस बीच उन्हें देखने वाला उनका हाथ पकड़ लेगा तो वो यही रूक जायेेंगे वरना हमेशा के लिए गये। उस ब्राहमण के अनुसार वो तीन बार दिखे। सबसे पहले एक रिश्तेदार को दिखे तो वो पहले बेहोश हो गये, फिर जग कर खोजा तो गायब। इसके बाद वो अपने पिता को दिखे तो वो भी मुर्छित हो गये। फिर अंतिम बाद वो अपने पत्नी को घर में स्थित एक पेड़ पर बैठे दिखे.....फिर वही हुआ उन्हें देखने के बाद वो भी अचेतावस्था में चली गयी। फिर वो कभी नहीं आये। अब इन कहानियों की पीके से तुलना करे तो करे तो लगता है कि वो भी सही है और ये भी सही है। कुछ तो लाजिक होगा जो दोनो अपने स्थान पर सही है। तो मेरे हिसाब से यही लगा कि भुत-प्रेत, दानव या देव, ईश्वर, भगवान हो या न हो पर इस दुनिया में पाजिटिव व निगेटिव चीजे हमारे बीच है। वह हमारे बीच जिस रूप में दिख जाय उसे वह नाम दे देते है। तब के निगेटिव चीजो को हटाने के लिए हमारे उस समय के पाजिटीव वाले संत, बाबा, फकीर, पीर दस चेले उन्ही के दृढ़शक्तियों को भुनाने का प्रयास करते हुए अपनी दुकानदारी चला रहे है।