Friday, 9 January 2015

बहुत याद आ रहा समा वो सुहाना



बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के राजीव गांधी दक्षिणी परिसर में 2009-10 में पोस्ट ग्रेजूएट डिप्लोमा इन जर्नलिज्म एंड मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई के दौरान उन दिनो के सफर को एक सुत्र में पिरोने को लिखी गयी कविता...इसके लिए विशेष आभार मित्र आशीष जायसवाल को......

बहुत याद आ रहा समा वो सुहाना,
कोई ये ना समझा, कोई ये ना जाना।

अगस्त का पहला सप्ताह, हुआ जब एडमिशन,
पहले बनी मेरिट हुआ फिर सलेक्शन।
हुई फिर दोस्तो से कैंपस आने की बाते,
यहीं से शुरू होती है, परिसर की यादे।

पीजीडी इन जर्नलिज्म एंड मास कम्यूनिकेशन है कोर्स का नाम बता दे,
कोर्स की पहली झलक आओ तुमको दिखा दे।
नवीर सर और साधना मैम है टिचर्स हमारे,
शुरू हुआ कारवां जिनके सहारे ।

बीस हुए थे एडमिशन, उन्नीस आते थे रोज,
सभी ने कहा चल बीसवे को खोज।
एक दिन जब क्लास में आयुषी आई,
देव ने कहा यही बीसवी है भाई ।

आदमी ने काटा कुत्ते को कैसे ?
इसकी बनेगी खबर बच्चो ऐसे।
ये थी पहली बात जो सर ने बताई,
न्यूज की परिभाषा थी हमको सिखाई ।

मैडम ने जो हमें पहली क्लास में पढ़ाया,
वो सब्जेक्ट हमारा जनसंचार कहलाया।
कान्सेप्ट, माडल्स की शुरू हुई कहानी,
पढ़ी फिर हमने फिल्म, दुरदर्शन और आकाशवाणी।

पहली प्रजेन्टेशन की पहली दकियानुसी,
वो विषय की गहराई, वो शब्दो की कन्जुसी।
ये गाने-तराने वो कैंटीन की क्लास,
प्राब्लम-साल्यूशन की पुरानी बकवास।

फिर रोज क्लास में जलेबियों का आना,
लेट होने पर हमेशा एक नया बहाना।
वो चाय की चुस्की वो "उड़ान" की मीटिंग,
वो एजेंडे को भूलकर फिचर की "सेटिंग" ।

फिर सर ने हमें सोशल कैपिटल और पब्लिक रिलेशन पढ़ाया,
पब्लिसिटी और प्रोपेगैंडा तब हमको समझ में आया।
पेपर और प्रोजेक्ट के साथ कोर्स जम जायेगा,
अगस्त का हमारा सफर अप्रैल में थम जायेगा।

बैठेंगे अकेले तन्हाई में जब भी,
सोचेंगे ऐसी बातो को तब भी।
बहुत याद आयेगा समा वो सुहाना,
कोई ये ना समझा कोई ये ना जाना। 

Wednesday, 7 January 2015

पीके पर मेरी जीके



पीके फिल्म को लेकर जो धार्मिक विवाद  हुए है, या हो रहे है, मै सर्वप्रथम उस पर न जाकर कुछ और बोलना चाहुंगा जो मैने फिल्म देखते समय पाया। विरोध करने वालो के लिए कहुंगा कि बोलने की अभिव्यक्ति सब की होनी चाहिए, वो भी अपने तर्को से न की हो हल्ला तोड़-फोड़ से। फिल्मे किसी के नजरिये से अच्छी और किसी के नजरिये से गलत होती ही है। सबक अपना नजरिया है।  पर सही और गलत के लिए उसी को जिम्मेदार ठहराना चाहिए, जिसका जो काम है। फिल्म में अगर संगीत गलत है तो गायक और उसे बनाने वाले, एक्टिंग गलत है तो एक्टर, कहानी गलत है तो लेखक, फिल्म बनी गलत है तो डायरेक्टर व प्रोड्यूसर। हर बात में एक्टर को गलत नहीं बताना चाहिए। पर क्या करे ये भी हमारे समाज का एक नजरिया ही बना है कि फिल्म के अच्छे या बुरे होने को हम एक्टर से ही जोड़ देते है, जिसे बदलना होगा। धार्मिकता से अलग भी मैने पीके फिल्म में कुछ चीजो को पाया है। जिसके लिए एक्टर गलत हो न हो, लेखक व डायरेक्टर इस मामले में जरूर लुल हो गये है। अब बताउ कि एलियन पीके धरती गोला पर आने के बाद यहां की भाषा सिखने के लिए एक लेडिस के पास जाता है और उसका हाथ पकड़ कर उसकी पूरी भाषा अपने अन्दर टिरांसफर मारता है। जिस लेडिस के पास पीके को भाया यानि संजय दत्त जिस काम के लिए ले गया था.....उसका पेशा क्या है.....फिल्म देखने वाले जानते ही होंगे। इस सब के बावजूद जब पीके न्यूज चैनल के आफिस पहुंचता है तो फिर कण्डोम के गिरे पैकेट को उठाकर सबसे पुछने के बाद चैनल हेड चैरी से क्यों पुछता है कि ये क्या है और इसका उपयोग क्या है। इसके बारे में तो पीके को लेडिस से भाषा टिरांसफर के दौरान सबसे ही पता हो जाना चाहिए था। इसके बाद एक पुलिस थाने में जब पीके भगवान पर केस दर्ज कराने जाता है तो पुलिस वाला उसके पास पड़ा ईसाई डाक्टर का पहचान पत्र देख उसे शराबी समझ कहता है कि अरे डाक्टर साहब इनता क्योें पीते हो कि अपना धर्म भुल जाते हो, चर्च की बजाय मंदिर जाकर दंगा करायेगे क्या। ये दंगा वाली लाइन से तो यही मैसेज जाता है कि दुसरे धर्म स्थल में नहीं जाना चाहिए, नहीं दंगा हो जायेगा। बात जगत जननी उर्फ जग्गु की करे तो वो अपने शादी के लिए चर्च जाती है, पर पूरे फिल्म में मैरेज रस्ट्रिरार शब्द का प्रयोग हुआ है। इस सबके बावजूद फिल्म उम्दा है। बात धार्मिकता वाले की करे तो तमाम प्रतिक्रियाओं को दरकिनार करते हुए मेरा मानना है कि फिल्म थोड़ी बैलेंसिंग बन सकती थी। जैसा कि ओ माय गार्ड थी। फिल्म में बाते बहुत कुछ है पर ज्यादा लिखने पर पढ़ने वाला बोर होता है तो बात को खत्म भी लगभग फिल्म के अंतिम डायलाग से खत्म करूंगा कि पीके कुछ सिख गया और कुछ सिखा गया। जैसा कि अब पीके पार्ट-2 की भी चर्चा शुरू हो गयी है, तो आशा रहेगी कि फिल्म इन विवादो और गलतियों से कुछ सिखेगी और पार्ट-2 में भी कुछ सिखायेगी।

Sunday, 14 September 2014

न्यू डिमांडिंग कालेज

वैसे चुनावी छात्रो के महत्वकांक्षा को देखते हुए अलग से एक छात्रसंघ चुनाव महाविद्यालय खोल देना चाहिए कम से कम जिसे पढाई करनी है उसे तो कोई परेशानी नही होगी ....महाविद्यालय में भी माहौल ठीक रहेगा...और जिसे नेता बनना है वो छात्रसंघ कालेज में जाये...उसमे टीचर के तौर पे पुराने छात्र नेताओ को रख दे जो चुनाव जीते और जो हारे है उन्हें भी...कम से कम दोनों अनुभव मिले उन्हें की हारने के बाद कैसे हर साल मैदान में पुनः खड़ा हुआ जाय....अब जब नियम बदल गया है तो कैसे दुसरे प्रत्याशी को खड़ा किया जाय बताये ......ये तो हारने का रहा दूसरा ये की जितने के बाद भी कैसे कई सालो तक छात्रसंघ चुनाव में नामांकन के समय प्रत्याशी के साथ दिख जाना.....और उन्हें देख कर लोगो का ये कहना की अभी एन इही हएन .....मतलब छात्रसंघ चुनाव तक ही सिमित है आगे नही गये .......जिले में इस तरह के कई नेता है जो हर जिले परदेश में मिल जायेंगे......जहा छात्रसंघ का मतलब बस हो हल्ला है दिखावीपन है.....अच्छे नेता बनने के कोई गुण नही है......गुण है तो बस जुगाडू नेता बनने के......भौकाली नेता बनने के.........हजारो के पम्पलेट सडको पे गिरा सकते है पोस्टर लगा सबके घर को गन्दा कर सकते है.......भाई चुनाव कालेज का है मुहल्ले व शहर का नही .......पम्पलेट पोस्टर में जो कागज व पैसे बर्बाद किये उससे किसे बच्चे को कापी व किताब दे सकते थे.......ये है सही नेता या छात्र नेता बनने की पहचान.......अरे लेकिन मै ये क्या कर रहा मै भी भाषण देने वाला नेता बन गया .......मंगरूआ तू का सुन थे तू कालेज में थोड़ो हए....तू परधानी में टराइ कर उ चुनाव आवत बा.....

चुनावी असर....बाई नजर

बहुत दिनों बाद कायदे से कोई जमीनी नेता के रूप में सामने नजर आया साईकिल से....भले ही मस्ती के लिए......बाकि तो जो आते है आप जानते है लोकप्रियता सस्ती के लिए...आज नगर के दो महा विद्यालयों के छात्रसंघ का नामांकन था...इसी नामांकन के दौरान किसी छात्र नेता की माला पाकर नगर के बच्चे भी नगर में घूम-घूम कर मस्ती लेते हुए अपना टेम्पो हाई कर रहे थे.....इन्हें देख कर मंगरूआ भी जोशिया गया बोला भैया हमहू अपना हिरोपुक निकाल के नामांकन कर आये क्या.....का पता अख़बार में फोटू भी आये .....हीरोपुक वाला नेता......हमने कहा कालेज का मुहना भी देखो हो कभी बेटा मंगरू .......कालेज का चुनाव है.....सभासदी, परधानी, सांसदी, विधायकी का नही...

इक मोहतरमा की स्कूटी

मेरे साथ गजब हो गया। इम्प्रेशन का बाई गाड डीस्प्रेशन हो गया। दरअसल ऑफिस के बाहर इक मोहतरमा का स्कूटी खराब हो गया। सेल्फ पे सेल्फ लिए जा रही थी पर स्कूटी स्टार्ट होने को तैयार नही था। संदेह वश मैंने उन्हें पहचान लिया। फिर क्या था मैंने मोहतरमा के मोहतरम को फोन लगा के जानकारी दी। उधर वो भी उधरी फोन घुमा रही थी। आखिर मुझे उधर से निर्देश मिला मदद का तो मै गया......जाने को अइसे भी चला जाता मदद को......पर सहमती से जाना ज्यादा सही है.....आजकल के दिनों में।यहा तक तो ठीक रहा इसके बाद जो हुआ उसका टक्कर कोई नवसिखिया ही ले सकता है। स्कूटी चालू करने तो चला गया पर बात वही थी जैसे किसी नोकिया 1100 यूज करने वाले को एंडराएड फोन दे दिया जाये। इतना पता था की ये अब सेल्फ से नही किक से स्टार्ट होगा। कालेज के दिन में अपने चालक का अनुभव था कुछ।पहले दो तीन किक मारी फिर मै खुद मददाभिलासी हो मोहतरमा से पुछ किक मारी और एक्सिलेटर ली फिर क्या .....जो हुआ वो नही होना चाहिए था। गाड़ी तो स्टार्ट हो गई पर इतनी तेज स्टार्ट हुई की मुझे 4-5 मीटर तक दौड़ा ले गई ।इक खड़ी गाड़ी में टक्कर मारी और फिर घूम के 2 मीटर और दौड़ाई इक और खड़ी गाड़ी में टक्कर मारने के बाद किसी तरह रुकी। ये तो शुक्र था रास्ते में कोई सजीव वस्तु नही आई....नही गाड़ी को कुछ हुआ....हल्का फुल्का मुझे जो लगा वो दंड स्वरूप मिला या प्रसाद पता नही। पर जो हुआ कुछ मेरी गलती थी जो बिना किताब पढ़े चल दिया था परीक्षा देने।इसके बाद तो मेरी दुबारा हिम्मत नही हुई मोहतरमा से बोलने की...फिर से स्टार्ट करु क्या । इस बात का अफ़सोस भी रहा क्यूंकि झटका खाने के बाद तरीका समझ आ गया था। फ़िलहाल उन्होंने अपने भाई को फोन कर बुला लिया । मेरी इस खता से मोहतरमा खफा नही हुई ...यही संतुष्टि थी...वैसे उन्होंने मेरे गिरते इंप्रेशन को यह कह कर संभाल लिया की कोई बात नही मै भी गिरती पड़ती रहती हु। ये तो बाद में
उनके मोहतरम से पता चला की उन्होंने मुझे तसल्ली देने के लिए कहा था। वैसे ठीक ही किया और कहा था....मुझे तो डर था की गाड़ी न टूटी हो..और उन्हें ये की मुझे तो नही लगी।वैसे उनके मोहतरम ने बता दिया की लगी कम होगी एक्टिंग ज्यादा करता है.....लगी तो थी इज्जत पे बाट.....जिसका दर्द ज्यादा गहरा होता है। वैसे स्कूटी के किक का सिस्टम भी बहुत उल्टा है। गाड़ी लडकियों के लिए है पर सुविधा नही है उनके हिसाब से। इक तो किक उल्टी तरफ वो भी काफी पीछे की ओर है। कम ही लडकिया होगी जो सेल्फ खराब होने के बाद स्कूटी स्टार्ट कर लेती हो वो भी बैठे बैठे......ये फोकट का एडवाईस है स्कूटी कम्पनी वालो को। काश अपनी भी कोई मोहतरमा होती स्कूटी वाली तो .....स्कूटी स्टार्ट करने का अनुभव हो गया होता।
लप्रेक-लव टाइम ऑफ़ नाच न आवे आगन टेड़ा

Tuesday, 12 August 2014

विस्थापन के दौर से गुजरती कजरी


                                
कजरी की जन्म स्थली माने जाने वाले विंध्याचल के ट्रस्ट और भ्रष्ट की राजनीति में भी जब देश की राजनीति की तरह बरसने के लिए आग ही बची हो, तो नजर मौसम की ओर कर लेनी चाहिए। भले ही देश के अन्य भागो में काले बादल अशुभ ब्रेकिंग न्यूज हो गए हो, पर विंध्य व उसके समीपवर्ती क्षेत्रों में इस मौसम में बादल शुभ ही है, अगर सुहाने होकर बरसे। सुहाने होंगे तो सावन में कजली गीतो में चार चांद लग जायेंगे । ये अलग बात है कि अब लोग बगीचों में न जाकर ‘‘गुगल सर्च‘‘ कर लेते है। कट, कापी, पेस्ट से फेसबुक पर कमेंट कर खुद को कजरी का काबिल समझने लगते है। जबकि एक वक्त था जब बारिश होती थी तो लोग बगीचों में दौड़ने लगते थे, और अब बरसात होती है तो बरामदे में जाते है कपड़े उतारने के लिए और खिड़की दरवाजे बंद करने के लिए। मैट्रो व आधुनिक शहरों का हाल तो यही है, पर अब विंध्य क्षेत्र भी इससे अछुता नही है। पहाडि़यों में विचरण करने वाले कोयल, डिंगुर की आवाज अब सुनाई नही देती। पहले कजली गीत बनते यर्थाथ से, पर अब वो यर्थाथ ही अब विस्थापित नजर आता है। संयुक्त परिवारो की आधार बेला टूट सी गई है। पोतियांे को दादी के साथ तो भतीजो को ताउ के समय बिताने का समय नही है। कजरी के विस्थापित होने पर कजरी गायिका मालिनी अवस्थी ने ठीक ही कहा है कि ‘‘ग्लोबलाइजेशन से भले ही बहुत फायदा हुआ हो, पर कजरी को नुकसान ही हुआ है। लोकगीत या कजरी जीवन की शैली है, वो बदला तो गीत-संगीत बदलेगा ही‘‘। संयुक्त परिवारो के टूटने से सब विस्थापित हो गया है। लड़कियों पास अब झूला-झूलने का समय नहीं है, इंट्रेस की तैयारी जो करनी है। किसान का लड़का अब किसानी नहीं करता तो वह मेंड़ पर कजरी क्या गायेगा?



Thursday, 12 June 2014

ईश्वर को ऐडवाइस की गुस्ताखी




भगवान शंकर,
     आजकल आपको मंदिर छोड़ शादियों में सज्जा रूप में देखा तो सोचा पत्र लिख कर अवगत करा दूं...कि आप बड़े सरल हो गये है....पहले जहां कई सालो की  तपस्या के बाद आप भक्त के पास आते थे और अब खुद तपस्या करने वाले स्टाईल में भक्तो का अभिनंदन कर रहे है। समारोह में गया तो कुछ काटूर्न लगे थे। कुछ प्लास्टिक के थे, तो कुछ के अन्दर इंसान छुपे थे। आपको देखा तो सोचा कि आप भी उसी स्वागत करने वाले कार्टून की तरह प्लास्टिक के है। पर ध्यान देने पर आपकी आंखो की हिलती पलके और घंटो खड़े होने की थकान ने बता दिया कि आप प्लास्टिक के नही बल्कि जीवात्मा है। जिन कार्यक्रमो में लोग ईश्वर को पूजते हुए अपने कार्यक्रम की शुरूआत व अंत करते है उस कार्यक्रम में आप ऐसे स्थित नजर आये, यह बात समझ नहीं आ रही कि ऐसा क्यों, कही इंसान अपना बदला तो नहीं ले रहा कि पहले वो खड़ा होता था आप के दर्शन के इंतजार में और आज अब आप खड़े हो रहे है उसके स्वागत इंतजार में। मैं भी तीन घंटे तक वहां रहा और आपके और भी अधिक समय तक खड़े होने की सहनशीलता और सरलता को देख रहा था और सोच रहा था कि कही आप गुस्से में अपना तीसरा नेत्र तो नहीं खोलेंगे.....अगर खोलते तो मैं दण्डवत होने के लिए तैयार था......पर ऐसा कुछ नहीं हुआ... कार्यक्रम अंत समय में आप अपने मंच से उतर और शालीनता पूर्वक चले गये। आपको इस तरह देखकर बस यही सोच रहा था कि आपका क्रोध वाला रूप सही है या फिर ये शालीनता वाला...........तुच्छ भक्त हूं पर इंसान भी हूं तो एक गुस्ताखी मैं भी कर रहा हूं आपको एक ऐडवाइस देकर.......ऐडवाइस अंग्रेजी शब्द है....समझते है ना आप......सारी भगवान आप तो अन्र्तयामी है.....हां तो  मै गुस्ताखी कर रहा था ये कि आप इतने शालीन मत बनिये और थोड़ा बहुत क्रोधित हो लिया करिये.....नहीं तो इंसान......आगे आपसे क्या-क्या करवायेगा......पता नहीं.....बाकी तो आप अन्र्तयामी हईये है। 


                                                                                                                      आपका 
                                                                                                  ऐडवाइस देने वाला गुस्ताख पत्रकार